3 Idiots इंसान, इंसान की सोच, इंसान के कर्म

3 Idiots इंसान, इंसान की सोच, इंसान के कर्म

3 Idiots
इंसान, इंसान की सोच, इंसान के कर्म

इंसान ये ऐसा एकमेव प्राणी है ज़िसे #असली_स्वार्थ पता है, उसका मतलब पता है. अब आपलोग बोलोगे मे तो सच्चा इंसान हु मेने कभी किसिको #स्वार्थ के लिये नही जोडा. पर ये बात हुई कहने के लिये पर असल ज़िन्दगी मे “हर एक व्यक्ति” कभी ना कभी अपने #स्वार्थ के लिये जीया है, कुछ कर्म कीए है. और आपलोगो को बताना चाहुंगा की #स्वार्थ ही ऐसी एकमेव चीज है ज़िसकी वजह से हर यूग में निर्माण का कारण हुआ है / बना है…!

ये तो हुआ कुछ संदर्भ, अब आपको कुछ स्पष्टीकरण देना चाहुंगा और वो भी कुछ उदाहरन के साथ…!

पिछले एक साल से #Covid-19 (#Corona) इस बिमारी ने पूरे जगत को समा लिया. हम सब उसकी चंगल मे ऐसे फसे है जेसे कोई दलदल मे फसता है…! ये बिमारी बहुत खतरनाक है ये मानता हु पर ये भी समझता हूँ की, बिमारी उतनी कारगर तभी साबित होती है जब हम उस बिमारी को समझने मे गलती कर देते है.
उदाहरन के तौर पे – जब बिमारी आयी तब हमें कुछ पता ना था, और जब आफत आयी तब हम इतना डर गए की क्या करे उसका कुछ पता न था, परीनाम lockdown हुआ. (ये है इंसान…,पहला subtitle )

जेसे पांचों ऊंगलिया बराबर नही होती वेसे ही सभी इंसान बराबर समझ रखने वाले नही होते. lockdown लगने के बावजुद लोग उसे seriously नही ले रहे थे खास करके ऐसे जगह पे ज़हा बहुत भीड़ बन जाती हो. उसका परीनाम ये हुआ की दिन पे दिन, महीने के महीने कहते कहते लगातार lockdown बढ़ता गया और उसका परीनाम देश के अर्थ व्यवस्था से लेकर आम आदमी की जेब तक सब खाली हो गयी…और ये बात ऊँही लोग अच्छी तरह समझते है ज़िनके उपर कोई ज़िम्मेदारी हो, वो इंसान कभी नही समझ सकता जिसने कठिन हालत मे भी सिर्फ अपने / खुदके बारे मे सोचा है… (और ऐसे ही इंसानो के सोच और कर्मो के कारण इंसान अब इंसान कहने के लायक नही रहा, क्यूंकी गलती चाहे एक इंसान करे, उसकी सजा हर एक इंसान भुगतता हैं…! ये है दुसरा और तीसरा subtitle – इंसान की सोच और कर्म)

रुको ज़रा आपलोगो को एक और बात पे गौर कराना चाहुंगा जो हमे आगे जाकर बहुत महंगी पडने वाली है…! और वो है #Oxigen

कहते है एक बार गलती करे वो इंसान होता है, पर बार बार same गलती करे तो वो इंसान #गधा केहलाता है… ये कहावत मे इसलिये कह रहा हूँ क्यूंकी इंसान को अभी तक #oxigen की #value पता नही है, और अगर पता है तो फिर उसे बिलकुल भी परवाह नही है…! मे ऐसा इसलिये कह रहा हु क्यूंकी पिछले कुछ दिनो से #oxigen ना मिलने की वजह हजारों मौत हुई है.
अरे मित्रो सृष्टी ने #oxigen हमे ये पेड पौधे के ज़रिये मोफत मे दिया है, हमे तो सिर्फ उसका ख्याल रखना है. पर क्या करे ये इंसान बहुत गर्व करता है अपने कर्म पर. और नतीजा ये है की, मुफत् मे मिलने वाला #oxigen आज / ज़रुरत पढने पर हजारों रूपये खर्च करके खरीदना पड़ता है। और इतना होने के बावजुद आपका प्यारा साथी बच जाए इसकी कोई #Gaurrantee नही होती.
और यही सोचकर, समझकर ये आपलोगो को विनंती करता हूँ की कृपया करके पेड पौधे लगायिये क्यूंकी यही पेड पौधे आगे चलकर हमारे काम आ सकते हैं. “”जेसे #पानी एक #जीवन है””
चाहे #पानी गंदा ही क्यू ना हो, उसका सही इस्तेमाल किया जा सकता है. और आजकल फिल्टर मशीन के वजह से ऐसा #पानी पीने लायक भी हो जाता है… तो सोचो असली #oxigen मिलने से इंसान कितना #Healthy रेह सकता हैं…

ये जो भगवान ने सृष्टी बनायी है ना उसमे हर कोई मुल्यवान योगदान देता है फिर चाहे वो इंसान हो, पशु पक्षी हो य़ा फिर पेड पौधे हो… और पेड पौधे के सहयोग से ही सृष्टी का जो चक्र है वो सही तरह से काम करता है…!
(ये जो मेने स्वार्थ की बात छेडी थी ये बात उनके लिए ही है जो पेड पौधे का महत्त्व जानते है, सृष्टी के सहयोग में अपना योगदान देते है और अपना वक़्त निकालकर ऐसे काम करते है. इस लेख के ज़रिये तमाम उनलोगो को मे बहुत आभार मानता हूँ क्यूंकी ऐसे लोगो की वजह से ही इंसानियत कायम रह पा रही है…! हमेशा स्वार्थ का अर्थ बुरा नही समझना जेसे कुछ लोगो ने शुरुवात के paragraph मे पड़ते हुये सोचा होगा, कभी कभी स्वार्थ का सही अर्थ अच्छे कामों मे भी होता है…

आशा करता हूँ की ये लेख आपको समझ और पसंद आया होगा. और उम्मीद करता हूँ की आपलोग सृष्टी सहयोग मे अपना योगदान देंगे और इंसानियत की नीव रखेंगे…

मयूर / महेंद्र

Facebook वर एक कविता पाहिली जी आताच्या काळात एकदम परफेक्ट #Match करते.

कविता

ऊन#सावली

सावलीत कसं थंड वाटतं अगदी,
तरी थोडे उन्हाचे चटके बसायला हवें…

सावलीत कसे शांत वाटतात डोळे,
तरी उन्हाच्या आगीनं भगभगायलाही हवें…

उन्हानं डोकं तापून भणभणेल तेव्हा,
तेव्हाच वाटेल एखादे झोपडे बांधायला हवे…

उन्हानं घामाच्या धारा लागतील तेव्हा,
तेव्हाच वाटेल सावलीपुरते एखादे झाड लावायला हवें…

उन्हानं जीवाची काहिली होईल तेव्हा,
वाटेल रानातनं थंडगार झुळकीनं यावें…

प्राणवायूवाचून जीव तळमळेल तेव्हा,
वाटेल एखादे तरी रान तरारून यावें…

जीव करपून जाईल तेव्हाच जाणवेल,
उन्हात तापत तरूंनी जपलंय मनोभावें…

“”निस्वार्थपणे देणाऱ्या निसर्गाला जपण्याचे,
उशिरा का होईना पण आता शहाणपण यावें…””

The poem was written by
©️मेधा प्रभुदेसाई

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